दिल्ली का जामा मस्जिद: मुग़ल सल्तनत की कलाकारी

 दिल्ली का जामा मस्जिद: दिल्ली की मुख्य मस्जिद 

delhi's jama masjid history and fact



मुग़ल जब 16वी शताब्दी में पहली बार भारत आये तब से लेकर अपने 200 साल के शासन में ऐसी-ऐसी अचंभित करने वाले स्मारक, मस्जिद और मक़बरे बनाये है जो आज भी लोगों को अचंभित करते हैं। बाबर जिसने भारत में मुग़ल सल्तनत की नींव रखी थी अपने शासन काल में खूबसूरत इमारतें बनाई। भारत के अनेकों हिस्सों में बाबर, हुमाऊं , अकबर, शाहजहाँ, औरंगजेब ने अपने-अपने काल में खूब स्मारक बनाये। दिल्ली की जामा मस्जिद इसी मुग़ल सल्तनत की कला का एक उदाहरण हैं। जामा मस्जिद जो की मुग़ल शासन में एक शाही मस्जिद हुआ करती थी आज वक़्फ़ बोर्ड और ASI के संरक्षण में हैं। अगर आप दिल्ली की जमा मस्जिद घूमने आने का प्लान बना रहे है तो आप सही जगह आये हो। इस ब्लॉग में हम दिल्ली की जामा मस्जिद के इतिहस और रोचक तथ्य के बारे में बात करेंगे। 

निर्माण -मुग़ल सम्राट शाहजहाँ 
कब बनी - 1656 ईस्वी में 
कहाँ स्थित -पुरानी दिल्ली 
एंट्री फीस - फ्री ( कैमरा चार्ज - Rs. 200/- , मस्जिद आँगन में प्रवेश - Rs. 70/- )
क्या-क्या देखे - 3 विशाल दरवाजे, प्रार्थना हॉल और मीनारें। 
घूमने का समय - सुबह 7 बजे से 12 बजे तक, दोपहर 1:30 से सूर्यास्त तक 
कैसे पहुँचे - नजदीकी बस स्टैंड (जामा मस्जिद बस स्टॉप )
                    नजदीकी मेट्रो स्टेशन ( जामा मस्जिद मेट्रो स्टेशन )
                    नजदीकी रेलवे स्टेशन ( दिल्ली जंक्शन )
आस-पास - लाल किला, चाँदनी चौक, मीना बाजार, राजघाट आदि। 


दिल्ली की जामा मस्जिद का निर्माण किसने करवाया

दिल्ली की जामा मस्जिद जिसे 'मस्जिद-ए-जहाँ-नुमा' कहा जाता है मुग़ल काल की एक अनौखी संरचना हैं। जामा मस्जिद का निर्माण मुग़ल सम्राट शाहजहाँ ने करवाया था। इसको निर्माण लगभग 6 सालों में पूरा हुआ। क्योंकि जामा मस्जिद का निर्माण 1650 से 1656 के बीच करवाया गया था। कुछ सोर्स में जामा मस्जिद का निर्माण 1644 से 1656 बीच बताया जाता हैं। लेकिन कोट किया हुआ समय 1650-1656 ही हैं। दिल्ली की जामा मस्जिद इतनी बढ़ी है की इसमें 25000 लोग एक साथ नमाज अदा कर सकते हैं।
दिल्ली की जामा मस्जिद का निर्माण शाहजहाँ ने शाहजहाँनाबाद (पुरानी दिल्ली) की सबसे ऊँची जगह पर करवाया था। इस मस्जिद को बनाने में लगभग 5000 मज़दूर लगे थे। ये मजदूर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आये थे जिनमे भारतीय, अरबी, फारसी और यूरोपियन शामिल थे। कहा जाता है की जमा मस्जिद को बनाने में उस समय 10 लाख रुपये का खर्चा आया था। मस्जिद का निर्माण साल 1656 में पूरा हुआ था। 23 जुलाई 1656 को सैयद अब्दुल गफूर शाह बुखारी ने दिल्ली की जामा मस्जिद का उदघाटन किया। 

दिल्ली की जामा मस्जिद के पुराने नाम 

दिल्ली की जामा मस्जिद का शुरूआती नाम ये नहीं था। जब यह मस्जिद बनी थी तब इसका नाम पुरानी मस्जिद था। जिसको शुरुआत में 'मस्जिद-ए-जहाँ-नुमा' कहा जाता था। जिसका अर्थ होता है पूरी दुनिया को दिखने वाला एक प्याला। बाद में इस मस्जिद का नाम जामा मस्जिद रखा गया। जामा मस्जिद का अर्थ होता है आम लोगों के बीच बनी मस्जिद जहाँ पर आम लोग इकट्ठा हो सके। भारत के कई शहरों में जामा मस्जिद नाम से मस्जिद बनी हुई हैं। 

दिल्ली की जामा मस्जिद पर हुए हमले 

दिल्ली की जामा मस्जिद पर मुख्य रूप से दो बार आतंकी हमले हुए थे। साल 2006 में तथा साल 2010 में लोगों में भय व्याप्त करने को ये हमले हुए किये गए थे। 
अप्रैल 2006 का हमला: यह हमला जयदा तीव्र नहीं था। 14 अप्रैल 2006 दिल्ली की जमा मस्जिद में इस हमले को अंजाम दिया गया। यह हमला जमा मस्जिद के गेट नंबर 1 पर हुआ था। इस हमले में कुछ लोग घायल हुए लेकिन मस्जिद को कोई नुकसान नहीं पहुँचा। 

सितम्बर 2010 का हमला: 19 सितम्बर 2010 को जामा मस्जिद में पर्यटकों से भरी बस पर कुछ लोगों ने गोलीबारी कर दी। यह हमला जामा मस्जिद के गेट नंबर 3 पर हुआ। इस हमलें की जिम्मेदारी इंडियन मुजाहिदीन (IM) ली। जिनके दो बाइके सवारों ने पर्यटक बॉस पर हमला किया। इस हमले में ताइवानी पर्यटक घायल हुए थे। क्योंकि भारत 2010 में पहली बार राष्ट्रमंडल खेलों की मेज़बानी कर रहा था। इसलिए इस हमले का उद्देशय राष्ट्रमंडल खेलों से पहले लोगों में भय पैदा करना था। 

दिल्ली की जामा मस्जिद कैसे पहुंचे 

दिल्ली की जामा मस्जिद शाहजहाँनाबाद जिसे वर्तमान में पुरानी दिल्ली कहा जाता है में लाल किला के पास स्थित हैं। इस मस्जिद तक आप सड़क, रेल और हवाई मार्ग से आ सकते हो। 
बस द्वारा - अगर आप बस द्वारा जमा मस्जिद आने की सोच रहे हो तो मस्जिद के सबसे नजदीकी बस स्टॉप जामा मस्जिद बस स्टॉप ही हैं। यह से आप रिक्शा या पैदल जामा मस्जिद जा सकते हैं।  

ट्रैन द्वारा - अगर आप जामा मस्जिद ट्रैन द्वारा आने की सोच रहे हो तो आपको पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन (दिल्ली जंक्शन) पर उतरना पड़ेगा। दिल्ली जंक्शन से जामा मस्जिद की दूरी मात्र 2.8 KM हैं। यहाँ से आप रिक्शा या टैक्सी द्वारा आ सकते हैं। जमा मस्जिद से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन मात्र 3.5 KM दूर स्थित हैं। यहाँ से आप मेट्रो से जामा मस्जिद जा सकते हो सकते हो। क्योंकि सबसे नजदीक मेट्रो स्टेशन वायलेट लाइन पर जामा मस्जिद मेट्रो स्टेशन पड़ता हैं। 

हवाई मार्ग - अगर आप जामा मस्जिद प्लेन द्वारा आने की सोच रहे हो तो आपको इंदिरा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरना होगा। यहाँ से जमा मस्जिद की दूरी 22-23 किलोमीटर हैं। हवाई अड्डे से आप एयरपोर्ट एक्सप्रेस लाइन से नई दिल्ली स्टेशन जाए और वहाँ से बदलकर पिली लाइन से जामा मस्जिद पहुंचे। 

दिल्ली की जामा मस्जिद में कैसे घूमे 

दिल्ली की जामा मस्जिद पुरानी दिल्ली के सबसे ऊँचे स्थान पर बनी है जिसमे 3 विशाल द्वार और 4 मीनारें हैं। जामा मस्जिद 40 मीटर ऊंची लाल बलुआ पत्थर की मीनारें है जहाँ से लाल किला और दिल्ली का पूरा नज़ारा दिखता हैं। 

तीन दरवाजे - जामा मस्जिद में 3 विशाल द्वार है जो की सैंडस्टोन से बने हुए हैं। इन तीनों द्वार के नाम पूर्वी द्वार, उत्तरी द्वार और दक्षिणी द्वार हैं। तीनो द्वारों में से पूर्वी द्वार सबसे खास है क्योंकि यह द्वार पहले केवल बादशाह और उनके साथियों के लिए उपयोग होता था। जामा मस्जिद का यह पूर्वी द्वार तीन मंजिला ऊँचा है जो केवल शाही प्रवेश के तौर पर काम आता था। बाकी उत्तरी और दक्षिणी द्वार आम लोगो के लिए काम आते थे। मस्जिद में प्रत्येक गेटों के तीन तरफ  सैंडस्टोन की सीढ़िया बनी हुई हैं। 
मस्जिद का आँगन - जामा मस्जिद दिल्ली का आँगन बहुत बड़ा है जिसकी एक तरफ की लम्बाई लगभग 100 मीटर हैं।  इस आँगन में 25000 लोग एक साथ नमाज पढ़  सकते हैं। जैसे ही आप मस्जिद के इस आँगन में पहुँचेगे तो आपको जामा मस्जिद की भव्यता का आभास होगा। मस्जिद में आंगन के बीच में एक वजू टैंक भी बना हुआ है जिसका इस्तमाल नवाज से पहले हाथ-मुँह धोते हैं। इस आँगन के चारो कोनों पर छतरिया बनी हुई है  जिससे मस्जिद के पास का द्रश्य दिखाई देता हैं। 
प्रार्थना हॉल - आप जामा मस्जिद में एक 61 मीटर लंबा और 27 मीटर चौड़ा प्रार्थना हॉल बना हुआ है उसे देख सकते हैं । इसकी छत पर मार्बल के तीन गुम्बद हैं। प्रार्थना हॉल का फर्श काली और सफेद मार्बल से बना हुआ है  खूबसूरत लगता हैं। 
मीनारें - जामा मस्जिद में इसके गुम्बदों के दोनों और 41 मीटर की मीनारे बनी हुई है जिनको आप देख सकते हैं। प्रत्येक मीनार पर 130 सीढ़ियाँ बनी हुई है। आईएनएस मीनारों के ऊपर मार्बल की छत्रिया भी बानी हुए है। 

दिल्ली की जामा मस्जिद में घूमने का समय और शुल्क 

जामा मस्जिद दिल्ली की मुख्य मस्जिद में आती हैं इसलिए यहाँ भीड़ रहती हैं। अगर आप जामा मस्जिद घूमने आ रहे है तो अक्टूबर-मार्च के बीच का समय सही रहेगा। इस समय आप दिल्ली की गर्मी से राहत पा सकते हैं।  मस्जिद में ईद,जुम्मा और शुक्रवार, गुरुवार को आने से बचे। क्योंकि इस समय भीड़ बहुत ज़्यादा रहती हैं। 
जामा मस्जिद में आने का सही समय सुबह 7 बजे से 12 बजे तक और 1:30 बजे से सूर्यास्त तक रहता हैं। नमाज के समय पर्यटकों को प्रवेश नहीं मिलता हैं। 
शुल्क - वैसे तो जामा मस्जिद में एंट्री निःशुल्क है लेकिन आप कैमरा ले जाते हो तो 200 रुपये टिकट लगता हैं। मस्जिद के आँगन में जाने का 70 रुपये टिकट लगता हैं। यहाँ से लाल किला और पुरानी दिल्ली का नजारा दिखाई देता हैं। 


दिल्ली की जामा मस्जिद का इतिहास 

दिल्ली की जामा मस्जिद भारत में मुग़लों की बादशाहत की एक अटूट निशानी रही है। जब से जामा मस्जिद का निर्माण हुआ तब से इस मस्जिद माँ राजनीतिक और सामाजिक महत्व रहा हैं। इस मस्जिद में 25000 लोग एक साथ नमाज अदा कर सकते है इसलिए यह मस्जिद आम लोगों के लिए मिलने-जुलने एक एक स्थान है। साल 1757 में इस मस्जिद में अफगान विजेता अहमद शाह दुर्रानी ने खुतबा पढ़ा था। 1803 में जब अंग्रेजों ने शाहजहाँनाबाद (पुरानी दिल्ली) पर कब्ज़ा लिया था उस समय उन्होंने जामा मस्जिद की मरम्मत करवाई।  उस समय यह मस्जिद लोगों के बातचीत की जगह बन गई थी। 
जब 1857 में विद्रोह हुआ था तब यहाँ कुछ अंग्रेजों की मौत हो गई थी। जिससे अंग्रेज बहुत नाराज हुए। उन्होंने कई मस्जिदे गिराना शुरू कर दी और बाकी मस्जिदों में मुस्लिम लोगों के इकठ्ठा होने पर रोक लगा दी थी । गुस्साए अंग्रेजों ने जमा मस्जिद पर कब्ज़ा कर लिया और यह धार्मिक कार्यों को बंद कर दिया गया। अंग्रेज मुस्लिम लोगो की भावनाओं को ठेस पहुंचने हेतु  मस्जिद को बैठक और सैनिकों के बैरक के तौर पर उपयोग करने लगे। इससे मुस्लिम लोग गुस्साए और 1862 में अंग्रेजों से मस्जिद वापस ले ली। 

23 अक्टूबर 1947 को जब भारत का बटवारा चल रहा था अबुल कलाम आज़ाद ने यही से मुस्लिम लोगों को भारत में रुकने की अपील की। 
दिल्ली की जामा मस्जिद की मरम्मत के लिए समय-समय पर कई इस्लामी लोगों ने मदद की। 1886 में, रामपुर के नवाब ने 1,55,000 , 1926 में, हैदराबाद के निज़ाम ने एक लाख की राशि तथा 1948 में, हैदराबाद के आखिरी निज़ाम, आसफ़ जाह VII ने तीन लाख की राशि मरम्मत के लिए दी। दिल्ली की जामा मस्जिद से अब्दुल्ला बुखारी ने 1986 में विवादग्रस्त बाबरी मस्जिद के लिए कई भाषण दिए। इसके नतीजन 1987 में जामा मस्जिद में बाबरी मस्जिद विवाद के विरोध में प्रदर्शन हुआ। बाबरी मस्जिद विवाद के विरोध में 28 मई को जामा मस्जिद पर काला कपडा लपेट कर विरोध किया गया और मस्जिद को बंद कर दिया गया। जामा मस्जिद आज भी कई आंदोलन और प्रदर्शन का साक्षी रहती हैं।   

दिल्ली की जामा मस्जिद के आस-पास घूमने लायक जगह 

लाल किला - दिल्ली का लाल किला जामा मस्जिद से मात्र 1 KM दूर स्थित हैं। जामा मस्जिद के सामने स्थित लाल किले पर आप पैदल जा सकते हैं। यह किला विश्व धरोहर में शामिल हैं। इस किले पर भारतीय नागरिकों के लिए Rs. 40/- और विदेशी नागरिकों के लिए Rs. 600/- एंट्री फीस हैं। लाल किला पहुँचने के लिए आप वायलेट लाइन का उपयोग करते हुए लाल किला मेट्रो स्टेशन पर पहुँचे। लाल किला मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर 4 से निकलने पर आप लाल किला के बिल्कुल सामने पहुंच जाओगे। 

मीना बाजार - जामा मस्जिद से मात्र 200 मीटर दूरी स्थित यह मार्केट कपड़ों और शादी-ब्याह के परिधानों के लिए जाना जाता हैं। यह बाजार मुग़ल काल से ही चला आ रहा हैं। यह बाजार सोमवार को बंद रहता है और बाकी दिनों में सुबह 11 बजे से 7:30 तक खुला रहता हैं। 

चाँदनी चौक - साल 1650 में बेगम जहाँआरा द्वारा बसाया गया यह मार्केट मुग़लकालीन वास्तुकला, थोक विक्रेता, स्ट्रीट फ़ूड और कपड़ों के लिए जाना जाता हैं। पास में एक नहर में चाँद की रोशनी चमकती थी जिससे इसका नाम चाँदनी चौक पड़ा। जामा मस्जिद से चाँदनी चौक की दूरी मात्र 400 मीटर हैं। 

राजघाट - यह जगह महात्मा गाँधी का समाधी स्मारक है। 31 जनवरी 1948 को उनकी समाधी पर एक संगमरमर का चबूतरा बनाया गया। वर्तमान समय में चबूतरे पर 'हे राम ' लिखा हुआ हैं।  जामा मस्जिद से गाँधी समाधी की दूरी मात्र 2.5 KM हैं। राजघाट के सबसे नजदीकी मेट्रो स्टेशन दिल्ली गेट मेट्रो स्टेशन हैं। यहाँ से आप पैदल या रिक्शा द्वारा राजघाट पहुंच सकते हैं। 



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