चित्तौडग़ढ़ किले का इतिहास और रोचक तथ्य

चित्तौडग़ढ़ जो प्राचीन समय में मेवाड़ की राजधानी कहलाता था जो की अपने अंदर ऐसी गाथाएँ समेटे हुए हैं जिनको सुन कर आज भी लोगो में जोश और जूनून आ जाता हैं। मेवाड़ की इसी राजधानी में जिसको प्राचीन चित्रकूट के नाम से भी जाना जाता था, सातवीं सदी में मौरी वंश के राजा चित्रांगद ने यहाँ चित्तौडग़ढ़ किले का निर्माण करवाया था। राजपूती शौर्य, बलिदान और वास्तुकला का अमर प्रतीक चित्तौड़गढ़ किला, जिसे 'भारत का गौरव' और 'किलों का सिरमौर' कहा जाता है, केवल पत्थरों का ढांचा नहीं है। यह राजस्थान की वीर धरा का वह हृदय है जिसने सदियों तक वीरता, त्याग और जौहर की गाथाएं लिखी हैं। बाद में 15 वी शताब्दी में महाराणा कुम्भा ने दुर्ग में स्थित अनेकों मंदिरों और ईमारतों में बदलाव किये। चित्तौडग़ढ़ किले पर हिंदू शासक से लेकर मुस्लिम शासक तक ने अधिकार किया हैं। इस किले पर अधिकार को लेकर कई गाथाएँ है जिसमें जोहर से लेकर किले की घेरावंदी शामिल हैं। बाद में 15 वी शताब्दी में महाराणा कुम्भा ने दुर्ग में स्थित अनेकों मंदिरों और ईमारतों में बदलाव किये। चित्तौडग़ढ़ किले पर हिंदू शासक से लेकर मुस्लिम शासक तक ने अधिकार किया हैं। इस किले पर अधिकार को लेकर कई गाथाएँ है जिसमें जोहर से लेकर किले की घेरावंदी शामिल हैं। किले परिसर में कई सारे दर्शनीय स्थल है हिन्दू मंदिर, कीर्ति स्तम्भ, विजय स्तम्भ, जैन मंदिर, तोप खाना और गौमुख कुंड आदि हैं। वर्तमान समय में यह किला विश्व धरोहर (UNESCO World Heritage Site ) के रूप में घोषित हैं। यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल (UNESCO World Heritage Site) की सूची में शामिल यह विशाल दुर्ग भारत के सबसे बड़े किलों में से एक है।
700 एकड़ में फैला यह किला मछली के आकार में बना है, जो गंभीर नदी के तट पर 180 मीटर ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। आज के इस ब्लॉग में हम इस किले के गौरवशाली इतिहास, इसके सात अभेद्य द्वारों, अनसुने तथ्यों और कुछ छिपे हुए स्थानों के बारे में गहराई से जानेंगे।
रोचक तथ्य :-
निर्माण - आठ वी सदी में
पहाड़ी - मेसा का पठार
क्षेत्रफल - 700 एकड़
द्वार - 07
दर्शनीय स्थल - विजय स्तम्भ, कीर्ति स्तम्भ, कुम्भा महल, मीरा मंदिर, कालिका माता मंदिर, पद्मनी महल, कुम्भा श्याम मंदिर, रत्नेश्वर मंदिर आदि।
जल स्रोत - 84 ( कुण्ड और बावड़ी )
प्रवेश शुल्क - रू. 40 /- (भारतीय ), रू. 600 ( विदेशी नागरिक )
लाइट एंड साउंड शो - सूर्यास्त के बाद रू. 150 /- ( भारतीय वयस्क ), 75 (भारतीय बच्चे )
चित्तौडग़ढ़ किले का इतिहास
चित्तौड़गढ़ का इतिहास शौर्य और त्रासदी का मिश्रण है। किंवदंतियों के अनुसार, इस किले का निर्माण पांडु पुत्र भीम ने किया था। ऐतिहासिक रूप से, 7वीं शताब्दी में मौर्य वंश के शासक चित्रांगद मोरी ने इसे बनवाया और इसका नाम 'चित्रकूट' रखा, जो बाद में 'चित्तौड़' हो गया। चित्तौड़गढ़ का इतिहास शौर्य और त्रासदी का मिश्रण है। किंवदंतियों के अनुसार, इस किले का निर्माण पांडु पुत्र भीम ने किया था। ऐतिहासिक रूप से, 7वीं शताब्दी में मौर्य वंश के शासक चित्रांगद मोरी ने इसे बनवाया और इसका नाम 'चित्रकूट' रखा, जो बाद में 'चित्तौड़' हो गया। आठवीं शताब्दी में पहली बार किले को मौर्य शासकों से छीन लिया था। ईस्वी 728 से 734 के बीच में यह किला पहली बार गुहिला शासक बप्पा रावल के कब्जे में आ गया। लेकिन कई जगह यह भी कहा जाता की यह किला उन्हें दहेज़ में मिला था। इसके बाद जब अरब भारत में आये तब चित्तौडग़ढ़ किले पर इन्होंने भी आक्रमण किये। इस किले ने भारतीय इतिहास के तीन सबसे बड़े 'साके' (वो युद्ध जहाँ वीरों ने केसरिया पहना और वीरांगनाओं ने जौहर किया) देखे हैं:
प्रथम साका (1303 ई.): अलाउद्दीन खिलजी ने रानी पद्मिनी की सुंदरता और किले पर कब्जे की चाह में आक्रमण किया। रावल रतन सिंह की वीरता और रानी पद्मिनी का 16,000 महिलाओं के साथ 'जौहर' आज भी रोंगटे खड़े कर देता है।
द्वितीय साका (1535 ई.): गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के आक्रमण के दौरान रानी कर्णावती ने हुमायूँ को राखी भेजी थी। सहायता समय पर न मिलने पर रानी ने जौहर किया।
तृतीय साका (1567-68 ई.): मुगल सम्राट अकबर के आक्रमण के दौरान जयमल और फत्ता (कल्ला जी) जैसे वीरों ने अद्भुत पराक्रम दिखाया।
चित्तौडग़ढ़ किले पर किन किन का शासन रहा
किले पर सबसे पहले शासन करने वाले लोग मौर्य वंश से थे क्योकि इनके द्वारा ही किले का निर्माण करवाया गया था। मौर्या के बाद गुहिल शासक बप्पा रावल ने आठवीं सदी में किले पर कब्ज़ा किया। जब आठवीं शताब्दी में अरबों का आगमन हुआ तब उन्होंने इस किले को हथियाने की कोशिश की। तब तक चित्तौड़गढ़ पर गुहिलों का ही शासन रहा। साल 1251 से 1258 के बीच अल्लाउद्दीन खिलजी ने अपने सेनापति बलबन की सहायता से किले को घेर लिया था। 1303 ईस्वी में अल्लाउद्दीन खिलजी ने रत्नसिंह को हराकर चित्तौडग़ढ़ किले पर कब्ज़ा कर लिया। किले पर विजय पाने के लिए अल्लाउद्दीन खिलजी ने 8 महीने तक घेराबंदी की। इसके बाद खिलजी ने चित्तौड़गढ़ का शासन अपने पुत्र खिजर खान को सौंप दिया। उस दौरान किले का नाम खिजराबाद भी पड़ा था। खिजर खान का शासन केवल 7 सालो तक ही चला। उन्होंने राजपूतों के दबाब के कारन शासन मालदेव को सौंप दिया। बाद में हम्मीर सिंह ने मालदेव से शासन छीन लिया। हम्मीर सिंह ने लंबा शासन किया और 1378 में उनकी मृत्यु गई। इनके बाद चित्तौड़गढ़ का शासन इसने पुत्र खेता राणा के हाथो में आया। 1382 ईस्वी में राणा लखा जो की राणा खेता के पुत्र थे ने शासन संभाला। 1433 ईस्वी में मेवाड़ के प्रसिद्ध शासक महाराणा कुम्भा ने चित्तौड़गढ़ का शासन संभाला। महाराणा कुम्भा ने 35 साल साल तक शासन किया। महाराणा कुम्भा ने इस दौरान सुदृढ बनाने में बहुत योगदान दिया। उन्होंने अपने शासन में कुल 32 किले बनवाये। 1473 ईस्वी में उनके पुत्र राणा रायमल में यहाँ की सत्ता संभाली। 35 साल शासन करने के बाद 1509 में जब राणा रायमल की मृत्यु हो गई तो सत्ता राणा सांगा के हाथों में आ गई। 19 साल के लंबे शासन कल के बाद 1528 में राणा सांगा की मृत्यु हो गई। महाराण सांगा के बाद मेवाड़ का शासन थोड़े-थोड़े समय अंतराल में अलग अलग शासकों के हाथों में आया। 1615 में जब राजपूत मुग़ल संधि हुए इसमें जहाँगीर ने अमर सिंह को चित्तौडग़ढ़ वापस दे दिया। इसके बाद ब्रिटिश शासन कल में 1905 के दौरान किले का जीर्णोध्दार करवाया गया।
चित्तौडग़ढ़ किले बनावट और द्वार
चित्तौडग़ढ़ किले की बात करे तो यह सब किलों का राजा हैं। क्योंकि यह किला सबसे बड़ा हैं जो की 700 एकड़ में फैला हुआ हैं। इस किले की बनावट की बात करे तो यह किला मछली के आकर का है जो की मेसा के पठार पर बना हुआ हैं। चित्तौडग़ढ़ किला गंभीर नदी के तट पर बना हुआ है जो 180 मीटर ऊंची मेसा की पहाड़ी पर हैं। चित्तौडग़ढ़ किला एशिया का एक मात्र ऐसा किला है जिसमें आबादी रहती हैं इसलिए इसे जीवंत किला भी कहा जाता हैं।
किले तक पहुँचने के लिए एक सर्पिलाकार मार्ग है, जो सात विशाल दरवाजों (पोल) से होकर गुजरता है। प्रत्येक द्वार का अपना सैन्य महत्व और इतिहास है। किले के सात द्वार है जिनमें वर्तमान समय में भी बड़े दरवाजे लगे हुए हैं।
1.पाडन पोल (Padan Pol)
यह पहला प्रवेश द्वार है। यहाँ देवलिया के रावत बाघ सिंह का स्मारक है, जिन्होंने दूसरे साके में वीरतापूर्वक प्राण त्यागे थे। इस द्वार के नाम को लेकर कहा जाता है कि एक बार भीषण युद्ध में खून की नदी बहने लगी जिसमें एक पाड़ा (भैंसा) बहता-बहता यहाँ तक आ गया था। इसी कारण इस द्वार को पाडन पोल कहा जाता है। बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर जब आक्रमण किया तब प्रतापगढ़ के रावत बाघसिंह ने मेवाड़ का राज्य चिन्ह धारण कर महाराणा विक्रमादित्य का प्रतिनिधित्व किया था और लड़ता हुआ इसी दरवाजे के पास वीरगति को प्राप्त हुआ।
2. भैरव पोल (Bhairon Pol)
यह द्वार चित्तौडग़ढ़ किले के सात प्रमुख प्रवेश द्वारों में से दूसरे नंबर का हैं। इस द्वार का नाम वीर योद्धा भैरवदास के नाम पर रखा गया था। 1535 में चित्तौड़ दुर्ग पर जब बहादुरशाह ने आक्रमण किया था तब भैरवदास ने दुर्ग की रक्षा करते हुए अपना मुंड कटवा दिया और शहीद हो गए। उनकी की स्मृति में इस द्वार का नाम भैरव पोल रखा गया। यह द्वार पाडन पोल और हनुमान पोल के बीच में स्थित हैं। इस द्वार पर प्रसिद्ध योद्धा जैमल और कल्ला राठौड़ की छतरियाँ भी बनी हुई हैं।
3. हनुमान पोल (Hanuman Pol)
हनुमान पोल द्वार चित्तौडग़ढ़ किले का तीसरा प्रमुख द्वार हैं जो की धार्मिक महत्व के लिए प्रसिध्द हैं। इस द्वार पर हनुमान जी का मंदरी है जिसकी वजह से इसका नाम हनुमान पोल रखा गया। इसकी खास बात ये है की यह द्वार एक घुमावदार रस्ते पर स्थित है जो की दुशमन को रोकने के लिए बनाया गया हैं। यह द्वार 1568 में अकबर द्वारा किये गए हमलों का साक्षी रहा हैं। वर्तमान समय में हनुमान जयंती पर यहाँ जोरदार सजावट होती हैं।
4. गणेश पोल (Ganesh Pol)
चित्तौडग़ढ़ का यह द्वार चौथा प्रमुख प्रवेश द्वार है जो कि हनुमान पोल और जोड़ला पोल बीच में स्थित हैं। इस द्वार के पास गणेश मंदिर है जिसके नाम से इस द्वार का नाम रखा गया। यह द्वार पुराने पत्थरों से बना हुआ है जिसमे तीरों के लिए खाँचे बने हुए हैं।
5. जोड़ला पोल (Jodla Pol)
यह द्वार किले का पाँचवा प्रवेश द्वार हैं जो की गणेश पोल और लक्ष्मण पोल के बीच में स्थित हैं। इस द्वार का जोड़ला नाम इसके लक्ष्मण द्वार के साथ जुड़े होने की वजह से पड़ा हैं। इस द्वार का ऊपरी मेहराब लक्ष्मण पोल से जुड़ा हुआ हैं।
6. लक्ष्मण पोल (Laxman Pol)
चित्तौड़ किले का यह दुर्ग छठा प्रमुख प्रवेश द्वार हैं। यह द्वार विशाल पत्थरों से बना द्वार है जो की जोड़ला पोल के ऊपर बना हुआ हैं। इस द्वार पर बारीक नक्काशी की गई है। इस द्वार पर लक्ष्मण जी का मंदिर है जिस पर इसका नाम लक्ष्मण पोल रखा गया हैं।
7. राम पोल (Ram Pol)
चित्तौड़गढ़ दुर्ग का सबसे प्रमुख द्वार रामपोल है जो की किले का अंतिम प्रवेश द्वार हैं। यह द्वार पश्चिम दिशा में स्थित हैं। यह द्वार भी स्थापत्य कला का शानदार नमूना हैं। राम पोल प्रवेश द्वार लक्ष्मण बाद स्थित हैं।
चित्तौड़गढ़ किले पर हुए मुख्य आक्रमण
सबसे पहला आक्रमण गुहिल शासक बप्पा रावल ने 728-734 के बीच किया जिसमें उन्होंने मौर्य शासकों से किला अपने कब्जे में ले लिया।
दूसरी बार चित्तौड़गढ़ पर अल्लाउद्दीन खिलजी ने करवाया जिसमे बलबन ने बार बार किले पर आक्रमण किया।
तीसरा आक्रमण भी अल्लाउद्दीन खिलजी ने 1303 में चित्तौड़गढ़ किले पर विजय प्राप्त करने के लिया किया। इस दौरान खिलजी ने आठ महीने तक किले की घेराबंदी की ।1311 तक चित्तौड़गढ़ खिलजी के कब्जे में रहा लेकिन उसके बाद वापस राजपूतो ने अपने कब्जे में ले लिया। इसके बाद बहुत लम्बे समय तक किले राजपूत शासकों के अधीन रहा।
चौथा मुख्य आक्रमण 1535 में बहादुर शाह ने चित्तौड़गढ़ किले पर आक्रमण किया और किले को लुटा।
पाँचवा आक्रमण 1567 में अकबर ने किया उस समय चित्तौड़ पर राणा उदय सिंह का शासन था। इसी आक्रमण के दौरान ही अकबर द्वारा चलाई गई तोप से जयमल मारा गया।
चित्तौडग़ढ़ में देखने लायक स्थल
कुम्भामहल
चित्तौड़गढ़ किले में कुंभा महल (वर्तमान में ), असल में बप्पा रावल ने 734 AD में बनवाया था और बाद में महाराणा कुंभा ने अपने राज में (1433-1468) इसे ठीक करवाया था। इस दो मंज़िला पत्थर के महल में छत वाली बालकनी और ज़मीन के नीचे तहखाने हैं जो अलाउद्दीन खिलजी की 1303 की घेराबंदी के दौरान रानी पद्मिनी के मशहूर जौहर से जुड़े हैं। कुम्भा महल विजय स्तम्भ के पास में भी स्थित हैं।
इसी जगह रानी पद्मनी ने अपनी दासियों के साथ जोहर किया।
इसी जगह के पास मीराबाई ने भगवान कृष्ण की भक्ति करते हुए जीवन व्यतीत किया।
मेवाड़ की आन-वान-शान बचाने के लिए यही पर पन्नाधाय ने अपने पुत्र का बलिदान देकर उदय सिंह की जान बचाई थी।
पदमनी महल
चित्तौड़गढ़ किले के दक्षिणी किनारे पर बसा पद्मिनी महल, दुखद घटना की एक दिल को छू लेने वाली निशानी है। यह शानदार तीन मंज़िला सफ़ेद महल, जिसे 19वीं सदी में राणा फ़तेह सिंह ने फिर से बनवाया था, नए ज़माने के "जल महल" स्टाइल को दिखाता है। यह रानी पद्मिनी का घर था, जहाँ अलाउद्दीन खिलजी ने 1303 में घेराबंदी के दौरान एक शीशे वाले कमरे में उनकी परछाई देखी थी, जिससे उनका जुनून रानी पद्मिनी को देखने के लिए भड़क उठा था। रावल रतन सिंह की हार के बाद, परानी द्मिनी ने अपनी दासियों के साथ एक बड़े जौहर का नेतृत्व किया। भारत के इतिहास में एक शानदार स्थान रखता हैं।
रतनसिंह महल
रतन सिंह महल चित्तौड़गढ़ किले के उत्तरी किनारे पर है, जो की राणा सांगा के बेटे महाराणा रतन सिंह द्वितीय (शासनकाल 1527–1531) ने इसे बनवाया था। यह राजस्थान के मुश्किल मौसम में शाही परिवार के लिए सर्दियों में एक रहने के लिए जगह थी। यह महल ऊँची दीवारों से घिरा एक चौकोर महल हैं। रतन सिंह महल के पास ही एक महादेव मंदिर है जिसे रत्नेश्वर महादेव से जाना जाता हैं।
समाधीश्वर मंदिर
चित्तौड़गढ़ किले के अंदर बना समाधीश्वर मंदिर, 11वीं सदी का एक शानदार वास्तुकला का उदाहरण है जो की भगवान शिव को समर्पित है। इस मंदिर को समाधि के भगवान के रूप में जाना जाता है। इसका निर्माण परमार राजा भोज या उससे पहले के शासकों ने करवाया था। इस मंदिर में भगवान शिव की अद्भुत त्रिमूर्ती प्रतिमा है जिसमें त्रिदेवों को एक ही मूर्ति में उकेरा गया हैं। इस मंदिर का बाद में महाराणा मोकल ने इसका जीर्णोद्धार करवाया। मंदिर में लगी भगवान शिव की मूर्ति एलीफेंटा की मूर्तियों की सामान है 1303 में अलाउद्दीन खिलजी के घेराबंदी के दौरान मंदिर में हुए क्षति को 15 सदी में महाराणा कुम्भा ने मरम्मत कराई। आज भी चित्तौड़गढ़ किले में समाधीश्वर मंदिर सुबह अभिषेक और सूर्यास्त समय आरती होती हैं।
कालिका माता मंदिर
चित्तौड़गढ़ किले के ऊपर बना कालिका माता मंदिर का निर्माण आठवीं शताब्दी में बप्पा रावल ने गुप्त शैली में करवाया था जो की उस समय भगवान सूर्य को समर्पित था। मंदिर की बनावट पांच कमरों वाली संरचना है जिसकी दिवार कमल के फूलों से अलंकृत हैं। दीवारों पर बने देवताओं की मूर्तियों के बीच आलों में सूर्य की नक्काशी हैं। मंदिर की सपाट छत नक्काशीदार खंभों पर टिकी हुई है। 1303 में अलाउद्दीन खिलजी की घेराबंदी के दौरान मंदिर में काफी क्षति हुए। 14 वी शताब्दी में महाराणा हमीर ने इस मंदिर की मरम्मत करवाई और माँ काली की प्रतिमा स्थापित की। चित्तौडग़ढ़ किले में बना कालिका माता मंदिर विजय स्तम्भ और पद्मिनी महल के बीच स्थित है। इस सामने एक सूर्य कुंड है जिस पर नवरात्री पूजा अर्चना होती हैं।
कुंभा श्याम मंदिर
चित्तौड़गढ़ किले में स्थित कुंभा श्याम मंदिर निर्माण महाराणा संग्राम सिंह ने अपने शासन काल में बनवाया था। कुंभा श्याम मंदिर का निर्माण महाराणा संग्राम सिंह ने मीराबाई के कहने पर बनवाया था। क्योंकि इसी मंदिर का उपयोग मीराबाई ने अपने प्रभु श्रीकृष्ण को की भक्ति में किया था। यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित हैं। कुंभा श्याम मंदिर पास ही मीराबाई के गुरु रविदास की छतरी जिसमे उनके गुरु के पैरों के चिन्हों को संरक्षित किया गया हैं।
मीरा मंदिर
चित्तौड़गढ़ किले के परिसर में कुंभा श्याम मंदिर के साथ ही मीरा मंदिर बनाया गया जिसका निर्माण महाराणा कुम्भा ने 16 वी शताब्दी में करवाया था। मीरा मंदिर एक ऊंचे चबूतरे पर बना हुआ है। इस मंदिर के गुम्बद पर पाँच इंसानी आकृति बानी हुई है जो की हिन्दू धर्म के वर्णों को दर्शाता हैं। मीराबाई ने यहां पर ही शाही अत्याचार के बीच भगवान कृष्ण की पूजा की और कई भजन लिखे। यह मंदिर कुंभा श्याम मंदिर मंदिर के पास बनाया गया हैं।
विजय स्तम्भ
चित्तौड़गढ़ किले में सबसे प्रमुख चीज़ किले में बना विजय स्तम्भ है जो की महाराणा कुम्भा के शौर्य और साहस का प्रतीक हैं। विजय स्तम्भ का निर्माण महाराणा कुम्भा ने 1448 से 1468 के बीच में करवाया। महाराण कुम्भा ने इस स्तम्भ को मालवा के महमूद खिलजी और गुजरात की सेना पर सारंगपुर में 1448 में उनकी जीत की याद में बनवाया। लाल बलुआ पत्थर से बना विजय स्तम्भ नौं मंजिला है जिसकी ऊँचाई लगभग 37 (122 फ़ीट ) मीटर हैं। विजय स्तम्भ में शानदार बालकनियाँ और झरोखें बने हुए। इसमें कुल 157 घुमावदार सीढिया बनी हुई हैं। विजय स्तम्भ भगवान विष्णु समर्पित है जो की डमरू के आकर का हैं। यह निचे से चौड़ा बीच में संकरा और फिर ऊपर से चौड़ा हैं। विजय स्तम्भ को वास्तुकार जेता ने अपने बेटों नापा, पोंमा और पूंजा के सहयोग के साथ बनाया। विजय स्तम्भ को हिंदू देवताओं का अजायबघर कहा जाता है। विजय स्तम्भ के तीसरी मंजिल पर 9 बार अरबी में अल्लाह लिखा हुआ हैं। विजय स्तम्भ राजस्थान पुलिस और माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का प्रतीक चिन्ह हैं।
कीर्ति स्तम्भ
चित्तौड़गढ़ किले में स्थित कीर्ति स्तम्भ जिसकों टॉवर ऑफ़ फेम भी कहा जाता है एक जैन स्मारक है। कीर्ति स्तम्भ का निर्माण 12वी शताब्दी में जैन व्यापारी जीजाजी राठौड़ ने करवाया जो की बघेरवाल जैन समुदाय के थे। कीर्ति स्तम्भ 22-24 मीटर लम्बा और सात मंजिला इमारत हैं जो की जैन तीर्थकर ऋषभदेव को समर्पित हैं। कीर्ति स्तम्भ का आधार 30 फ़ीट चौड़ा है और ऊपर से इसका शीर्ष संकरा हैं। कीर्ति स्तम्भ में जैन धर्म के 24 तीर्थकरों की नक्काशीदर मूर्ति लगी हुई हैं। कीर्ति स्तम्भ में कुल 54 सीढिया है जो की विजय स्तम्भ में लगी सीढ़ियों से काफी काम हैं।
चित्तौड़गढ़ किले में इन सभी मुख्य स्थलों के अलावा और बहुत सारे स्थान है जो देखने लायक है। जिनमे गोमुख कुंड, श्रृंगार चौरी, सतबीस देवरी मंदिर, पता का स्मारक, कुकड़ेश्वर का कुण्ड तथा कुकड़ेश्वर का मंदिर, हिंगलू आहाड़ा के महल तथा रत्नेश्वर तालाब, लाखोटा की बारी, महावीर स्वामी का मंदिर, नीलकंठ महादेव का मंदिर, सूरजपोल तथा चूड़ावत साँई दास का स्मारक, अद्बद्जी का मंदिर, राजटीला तथा चत्रंग तालाब, चित्तौड़ी बूर्ज व मोहर मगरी आदि दर्शनीय स्थल हैं।
चित्तौडग़ढ़ किले के आस पास देखने लायक जगह
बस्सी वाइल्डलाइफ़ सैंक्चुअरी - यह किले से लगभग 25 km दूर है जो की पैंथर, हिरण और बर्ड वॉचिंग के लिए मशहूर।
सीता माता वाइल्डलाइफ़ सैंक्चुअरी - यह किले से लगभग 50 km दूर है जो की एक घना जंगल वाला इलाका है और पेड़-पौधों और जानवरों से भरपूर है।
मेनाल वॉटरफ़ॉल्स - यह किले परिसर से लगभग 90 km दूर जो की एक सुंदर जगह है जो अपने झरनों और प्राचीन शिव मंदिरों के लिए जानी जाती है।
सांवरियाजी मंदिर - यह मंदिर चित्तौडग़ढ़ किले से लगभग 40 km दूर है जो की भगवान श्री कृष्ण के लिए प्रसिध्द हैं।
मंडलगढ़ किला - यह किला चित्तौडग़ढ़ किले से लगभग 54 km दूर है जो की भीलवाड़ा जिले में स्थित हैं। इसका निर्माण मंडिया भील द्वारा करवाया गया जो की काफी युध्दों का साक्षी रहा हैं।
विश्वास स्वरूपम - इसे स्टेचू ऑफ़ बिलीफ भी कहा जाता हैं। यह चित्तौडग़ढ़ किले से लगभग 80 km दूर है जो नाथद्वारा में स्थित हैं। यह भगवन शिव की विश्व की सबसे ऊँची 369 फ़ीट की मूर्ति हैं जो की देखने लायक है।
उदयपुर - अगर आप चित्तौडग़ढ़ घूमते हो तो आपको उदयपुर भी जरुर आना चाहिए। उदयपुर में बहुत सारे खूबसूरत जगह है जिनमे सिटी पैलेस, पिचौला झील, सज्जन गढ़, फ़तेह सागर झील आधी देखने लायक जगह हैं। झीलों की नगरी कहे जाने वाला उदयपुर चित्तौडग़ढ़ किले से 117 km दूर हैं।
कुम्भलगढ़ फोर्ट - कुम्भलगढ़ फोर्ट चित्तौडग़ढ़ किले से लगभग 100 km दूर है जो की राजसमंद जिले में पड़ता हैं। कुम्भलगढ़ किला जहाँ पर विश्व की दूसरी सबसे लम्बी दिवार हैं। जिसकी लम्बाई 36 km हैं।
बूंदी - आप अगर महल और बावड़ियों को देखने में रूचि रखते है तो बूंदी जिला इसके लिए सही जगह हैं। यह चित्तौडग़ढ़ लगभग 140 km दूर है जो की हाड़ौती साम्राज्य का गढ़ हैं।