History and interesting facts about Kumbhalgarh Fort ( कुम्भलगढ़ किला का इतिहास और रोचक तथ्य )

कुम्भलगढ़ किला के बारे में सप्पूर्ण जानकारी और रोचक तथ्य 





मेवाड़ की धरा वैसे तो अपने आप में बहुत सारी गाथाएं समेटे हुए हैं। उनमे से कुम्भलगढ़ दुर्ग एक है। अरावली की पहाड़ियों में अडिग और अचल, मेवाड़ की शान कहलाने वाला कुम्भलगढ़ किला भारतीय इतिहास की शौर्यपूर्ण गाथा का एक उदारण हैं। महाराणा कुम्भा द्वारा बनाया गए, इस किले को आज के दौर में विश्व धरोहर के रूप में घोषित किया हैं। इसी ऐतिहासिक किले में महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था। इस दुर्ग में अनेकों मंदिर बावडिया हैं। किले के चारों ओर 36 किलोमीटर की दीवार इसकी अपने आप में एक खूबी हैं। इस दुर्ग को कटार गढ़ के नाम से भी जाना जाता हैं। 
इस किले की एक और खासियत यह है की यह दूर से आसानी से दिखाई देता हैं लेकिन पास आते ही गायब हो जाता हैं। इसकी वजह ये है की यह किला अरावली की तीन पहाड़ियों के बीच में बना हुआ हैं। कुम्भलगढ़ किले के एक तरफ मारवाड़ का रेगिस्तान और दूसरी तरफ अरावली की पहाड़ियों की ख़ूबसूरती। 



कुम्भलगढ़ किले का निर्माण और इसके पीछे की कहानी 

अरावली की ऊँची चोटी पर बना कुम्भलगढ़ किले का निर्माण 15 वी शताब्दी में महाराणा कुम्भा के द्वारा कराया गया। यह किला अशोक सम्राट के पोते सम्प्रति के द्वारा बनाई गई ईमारत के अवशेषों के ऊपर बनाया गया हैं। महाराणा कुम्भा ने इस किले का निर्माण 1443 में शुरू किया था। कहते है इस किले को बनाने में काफी कठनाईयो का समान करना पड़ा। उनमे से एक बहुचर्चित समस्या यह की किले की दिवार का बार-बार गिरना। इस किले को बनाने में लगभग 15 वर्ष का समय लगा था।  15 वर्षो की कठिन परेशानियों के बाद 1458 में इस किले का निर्माण हुआ। किले के चारो तरफ 36 किलोमीटर लम्बी दिवार बनाई गई हैं जो की विश्व की दूसरी सबसे लम्बी दिवार हैं। 
इस किले का निर्माण दो भागों में हुआ। महाराणा कुम्भा ने इसे कुम्भा महल तक बनवाया था। कुम्भलगढ़ किले में मौजूद बादल महल का निर्माण राणा फतेह सिंह जी ने 1885-1930 के दौरान कराया। 



इस किले के निर्माण को लेकर एक प्रचलित कहानी है की जब इस किले का निर्माण किया जा रहा था तो दिन में जैसे ही दिवार का निर्माण होता रात्रि काल में ये दिवार वापस गिर जाती। इस समस्या से परेशान होकर महाराणा कुम्भा एक भैरव मुनि के पास गए।  जब मुनि को इस बारे में सब कुछ ज्ञात कराया तो उन्होंने यहा देवी का प्रकोप बताया। ऋषि ने कहा की यहां देवी को नर बलि की जरुरत हैं। लेकिन नर बलि के लिए जब कोई तैयार नहीं हुआ तो ऋषि ने खुद अपने आप को बलि देने को कहा। उन्होंने महाराणा कुम्भा से कहा की जहा में पहली बार रुकु वही मेरा सिर धड़ से अलग कर देना। इस प्रकार इस किले का निर्माण में आई बाधा दूर हुई। आज भी किले का एक द्वार भैरव मुनि के नाम से है जो भैरव पोल कहलाता है। भैरव मुनि का धड़ चलते चलते बादल महल में गिरा आज वहा भैरव बाब का मंदिर है। 

 कुम्भलगढ़ किले की संरचना और स्थल 

कुम्भलगढ़ किले का निर्माण सुरक्षा की द्रष्टिकोण से किया गया था। जब महाराणा कुम्भा ने इस किले का निर्माण करवाया तो उन्होंने यही आदेश दिया की इसका निर्माण ऐसे हो की इसे कोई जीत न सके। इसी वजह से इस किले को उस टाइम कोई भी आक्रमणकारि क्षति नहीं पहुंचा पाया। कुम्भलगढ़ किले में 9 द्वार हैं। जोकि आरेट पोल, हल्ला पोल, हनुमान पोल, राम पोल ( किले का मुख्य प्रवेश द्वार), भैरव पोल, निम्बू पोल, चौगान पोल, पागड़ा पोल, विजय पोल के नाम से जाने जाते हैं। किले में 365 मंदिर है इनमे 65 हिन्दू मंदिर और 300 जैन मंदिर हैं। दुर्ग में स्थित सभी मंदिरों में से कुछ मंदिरों में ही मूर्ति साबुत है बाकी ज़्यदातर मंदिरों में मूर्तियाँ खंडित हैं। 

किले के सभी द्वार

1. आरेट पोल (Aaret Pole ) 
कुम्भलगढ़ किले का सबसे पहला प्रवेश द्वार हैं जो मारवाड़ को मेवाड़ से जोड़ता हैं। पुराने टाइम पर किले का मुख्य प्रवेश द्वार यही था। आज के टाइम के आधुनिक रास्तों की वजह से यह गेट किले के मुख्य सुरक्षा द्वारों की लाइन से अलग हो गया हैं। यह गेट किले से लगभग 5 किलोमीटर दूर केलवाड़ा की तरफ जाने वाले रास्ते में पड़ता हैं। पर्यटकों की के लिए आज भी यह गेट आकर्षण का केंद्र बना रहता हैं।

2. हल्ला पोल (Halla Pole )  
किले के नौ प्रवेश द्वारों में से हल्ला पोल दूसरे स्थान का प्रवेश द्वार हैं। यह द्वार किले के पहले प्रमुख प्रवेश द्वार आरेट पोल और किले के तीसरे प्रवेश द्वार हनुमान पोल के बीच में पड़ता हैं। इस द्वार को युद्ध के द्वार के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यही से ही दुशमन सेना पर हल्ला बोलकर उसे धरासाई कर दिया जाता था। इस द्वार के पास ही एक बावड़ी है जिसे बादशाह बावड़ी के नाम से जाना जाता हैं। 

3. हनुमान पोल (Hanuman Pole )
किले प्रवेश द्वारों में से हनुमान पोल तीसरे नंबर का प्रवेश द्वार हैं। इस द्वार का नाम इसपर स्थापित  हनुमान जी की अष्टकोणीय बुर्जो वाली प्रतिमा के नाम पर हैं। यह मूर्ति महाराणा कुम्भा मंडोर विजय के बाद यह स्थापित किये थे। हनुमान पोल पर लगी हनुमान जी यह प्रतिमा लगभग 580 वर्ष पुराणी हैं। जो आज भी उसी स्थति में स्थापित हैं।   वर्तमान समय में भी इस द्वार पर पुराने विशालकाय दरवाजे लगे हुए हैं। 

4. राम पोल (Ram Pole )  
किले की मुख्य परिसीमा में प्रवेश करने का मुख्य द्वार यही है। यह किले के प्रवेश द्वारों में से चौथे स्थान का प्रवेश द्वार है जो की हनुमान पोल के बाद स्थित हैं। इस द्वार से केवल शाही लोग ही दुर्ग परिसर में प्रवेश करते थे। इस द्वार पर वर्तमान समय में कोई दरवाजा नहीं लगा हुआ हैं। 

5. विजय पोल (Vijay Pole )


किले का यह प्रवेश द्वार हनुमान पोल से चलते हुए राम पोल द्वार के दाहनी ओर लगभग 200 मीटर दूर स्थित हैं। यह द्वार किले की दिवार पर बने बुर्जो के बीच बना हुआ हैं। इस द्वार में भी वर्तमान समय में भी विशाल पुरानी लड़की के दरवाज़े लगे हुए हैं। द्वार के अंदर की तरफ दोनों तरफ बड़े रूम बने हुए है जो शायद पहले के समय में सैनिकों के उपयोग के लिए होंगे। 




6. भैरव पोल (Bhairaw Pole)
यह द्वार किले परिसर में बादल महल की ओर जाने पर रास्ते में स्थित हैं। इस द्वार का नाम भैरव ऋषि के नाम पर रखा गया हैं। क्योंकि भैरव ऋषि ने ही देवी के प्रकोप को दूर करने के लिए खुद की बलि दी थी। भैरव मुनि जब किले की परिसीमा निर्धारण कर रहे थे तब वो पहली बार यही रुके थे। इस द्वार से थोड़ा आगे चलने पर भैरव बाब का एक स्थान है, इसी जगह पर महाराणा कुम्भा ने उनका सर काटा था।  

7. नींबू पोल (Nimbu Pole)
भैरव पोल से आगे की तरफ बढ़ने पर अगला द्वार निम्बू पोल ही आता हैं। 3 अप्रैल 1578 को अकबर के सेनापति शहबाज़ खान ने भीषण घेराबंदी के बाद कुम्भलगढ़ किले को अपने आधिपत्य में किया था। तब शहबाज खान ने सामने की पहाड़ी से तोप का गोला दागा जो किले के इस द्वार पर आकर लगा।  आज भी तोप के उस गोले के निशान इस द्वार पर स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं।  

8. चौगान पोल (Chaugan Pole)
यह द्वार नींबू पोल के बाद स्थित हैं। इस द्वार की खासियत यह है की इसके बाहर की और तीखा घुमाव है, जिससे की इस द्वार के दरवाज़े को तोड़ने के लिए पर्याप्त बल का उपयोग नहीं किया जा सकता। क्योकि इस गेट के बहार इतनी जगह नहीं है की इस पर जोर से धक्का लगाया जा सके। इसके दरवाजे पर नुकीले लोहे के किले है जो की दरवाज़े को हाथी के हमले से बचाने में सहयक होता हैं। 

9. पागड़ा पोल (Pagda Pole)
यह द्वार किले परिसर का अंतिम द्वार है जोकि महाराणा प्रताप की जन्म कक्ष के पीछे हैं। इस द्वार से अंदर आने पर एक तरफ बदल महल परिसर है और दूसरी तरफ कुम्भा महल हैं। द्वार के बिल्कुल पास में ही एक पानी का टैंक और उसी टाइम का पानी फ़िल्टर करने के तरीके का तकनीक बनी हुई हैं। इस द्वार के अंदर प्रवेश करते ही उस टाइम की शाही घुड़साल बानी हुए हैं जिसमे शाही घोड़े रहते थे।


दुर्ग में स्थित देखने योग्य स्थल  

कुम्भलगढ़ किले में बहुत सारे देखने योग्य स्थल है जिनमे कई पुराने मंदिर और बावड़ियाँ शामिल हैं। किले परिसर में 15वी शताब्दी से भी पहले के भी कई स्ट्रक्चर है जो की भारतीय वास्तुकला का एक अदभुत उदाहरण हैं। 

1. बादशाही बावड़ी (Badshahi Bawdi)
बादशाही बावड़ी किले के हल्ला पोल द्वार से अंदर प्रवेश करने द्वार से 500 मीटर दूर स्थित हैं। यह बावरी हनुमान पोल और हल्ला पोल द्वार के बीच में स्थित हैं। इस बावड़ी का निर्माण 1578 में शाहबाज़ खान ने दुर्ग पर चढाई करने के दौरान सैनिकों की प्यास बुझाने के लिया किया। शाहबाज़ खान ने कुम्भलगढ़ किले के चारो तरफ 6 महीने तक घेराबंदी की। उस समय उनकी पूरी सेना किले के सामने वाली पहाड़ी ( पुराना नाम - राम की टेक ) डेरा डाले रही और इसी बावड़ी का उपयोग पानी के लिया किया गया।

2. विश्व की दूसरी सबसे लंबी दिवार ( Second Largest Wall )

कुम्भलगढ़ किले के पास इसकी एक खूबी है इसकी दिवार, जो इसको विश्व धरोहर के रूप में स्थान देती हैं। किले के चारो तरफ 36 किलोमीटर लंबी दिवार है जो " ग्रेट वॉल ऑफ़ चाइना " के बाद दूसरे स्थान पर आती हैं। यह दिवार अंदर से पूरी तरह ठोस है जिसे क्षति पहुँचाना मुश्किल हैं। इस दिवार की चौड़ाई 21 फ़ीट है जिस पर चार घोड़े एक साथ चल सकते थे। इस दिवार की एक ओर खासियत ये है प्रत्येक 30 मीटर की दूरी पर आपको दिवाप पर चढ़ने को सीढिया मिलेगी। दिवार पर भैरव पोल द्वार से लेकर विजय पोल द्वार तक कलश रूपी 25-30 बुर्ज बने हुये हैं। ये बुर्ज दिवार की सुंदरता में चार चाँद लगा देते हैं। वर्त्तमान समय में केवल 12 किलोमीटर लम्बी मुख्य दिवार ही ऐसी है जिसपे आसानी से चला जा सकता हैं बाकी दिवार क्षतिग्रस्त हो गई हैं। 

3. गणेश मंदिर (Ganesh Temple)
किले के रामपोल द्वार से अंदर की ओर बदल महल के रास्ते पर स्थित हैं। इस मंदिर का निर्माण भी महाराणा कुम्भा ने करवाया था। इस मंदिर के निर्माण में चुने और ईंटो का इस्तेमाल किया गया हैं। मंदिर में सब मंदिरो की तरह गर्भगृह और मण्डप  हैं। मंदिर के ऊपर गुंबदाकार छत है।इस मंदिर के गर्भ ग्रह में पत्थर से निर्मित गणेश जी की मूर्ति लगी हुए है जो महाराणा कुम्भा के समय की स्थापित हैं। मंदिर दक्षिणामुख है और इसपे चढ़ने के लिए पुराने पत्थरों से निर्मित सीढ़िया बानी हुई हैं।  कुम्भलगढ़ किले के कुछ मंदिर जिनमें आज भी मूर्ति खंडित नहीं है उनमें से एक मंदिर यह गणेश मंदिर भी हैं।  

4. चार भुजा मंदिर (Charbhuja Mandir)
यह मंदिर रामपोल द्वार से किले परिसर में प्रवेश करने पर बाई ओर गणेश मंदिर के बिलकुल पास में स्थित हैं। यह मंदिर चढ़ती ढलान के ऊपर एक परकोटे में स्थित हैं। मंदिर के गर्भगृह में चारभुजा नाथ जी की मूर्ति स्थित हैं। मंदिर में एक प्रवेश द्वार गणेश मंदिर के बगल में इसके चारो ओर बने परकोटे पर बना हुआ है और दूसरी तरफ एक छोटा द्वार भी बना हुआ है जिसके पास से सीढिया निचे उतरते हुए गणेश मंदिर के पास आके खत्म होती है। इस मंदिर में भी मूर्ति पूरी तरह साबूत हैं। मंदिर के छत पर एक गुम्बदाकार घेरा है जो ईंटो से बना हुआ हैं। 

5. वेदी मंदिर (Vedi Mandir) 



किले परिसर में यह मंदिर समूह राम पोल द्वार से प्रवेश करने पर दाहनी ओर परकोटे में स्थित हैं। यह मंदिर कुम्भलगढ़ के उन भव्य मंदिरों में आता है जिनको महाराणा कुम्भा ने 15वी शताब्दी में बनाया था। इस मंदिर का दूसरा नाम यज्ञ वेदी भी है क्योंकि महाराणा कुम्भा ने इसको किले का पूरा निर्माण होने के बाद यज्ञ सम्पन्न करवाने हेतु बनवाया था।  मंदिर का परकोटा एक ऊँचे चबूतरे पर स्थित है जो की एक ओर किले की दिवार से घिरा हुआ हैं। यज्ञ वेदी के नीचने वाले कक्ष खुले हुए है और ऊपर वाले हिस्से पत्थर से अलंकृत जालियों से ढका हुआ हैं। यज्ञ वेदी के ऊपर वाले मंजिल में चार छोटे हिस्से बने हुए है जिसका एक हिस्सा खुला हुआ है। वेदी मंदिर के ऊपर के छत पर एक विशालकाय गुम्बद बना हुआ है। यज्ञ वेदी के सामने एक चार स्तम्भ युक्त मंडप है जो की उस समय पशुबलि देने के लिए उपयोग आता था । इस मंडप के दूसरी तरफ त्रिकूट मंदिर है जिसमे भगवान विष्णु की षष्ट भुजा मूर्ति हैं। इन मूर्तियों को दोनों तरह भगवान विष्णु के वाहन मानव रूप में खड़े दीखते हैं। इन त्रिकूट मंदिरों के गुम्बद पर पत्थर की नक्काशी की गई हैं। वेदी मंदिर समूह के परकोटे का एक दरवाजा रामपोल द्वार की तरफ और दूसरा दरवाज़ा पीछे की ओर पार्शव नाथ मंदिर की ओर खुलता हैं। 

6. नीलकंठ महादेव मंदिर (Nilkanth Mahadev Mandir)



कुम्भलगढ़ किले में सबसे आकर्षित और चर्चित मंदिर नीलकंठ महादेव मंदिर हैं। इस मंदिर को महाराणा कुम्भा 1458 ईस्वी में अन्य मंदिरों से अलग तरीके से बनवाया। नीलकंठ महादेव मंदिर वेदी मंदिर के पीछे के तरफ बना हुआ है। इस मंदिर में कुल 25-30 खड़े स्तम्भ है जिन पर मंदिर की छत टिकी हुए हैं। मंदिर की छत पर छोटे बड़े मिलाकर सात गुम्बद बने हुए है। सात गुम्बदों में एक जो इन सबके बीच में बना हुआ है बाकी सब से बड़ा है और शिखर पर कमलाकर कलश बना हुआ हैं । नीलकंठ महादेव मंदिर के स्तम्भ और छत पर पत्थरों से जोरदार नक्काशी की गई हैं। मंदिर के गर्भग्रह के बीच में भगवान शिव का शिवलिंग बना हुआ है जिसकी उंचाई लगभग 5 फ़ीट हैं। इस लिंग की खास बात ये है की ये एक विशेष तरीके के काले पत्थर से बना हुआ है जिसका उपयोग पहले सोने की शुध्दता पता करने को किया जाता था। कहते है की महारणा कुम्भा जो की अपनी हाइट के लिए जाने जाते है , जब पूजा करने बैठते थे तो उनका सिर शिवलिंग के बराबर तक पहुँचता था। मंदिर के गर्भग्रह के सामने एक पत्थर शिला पर विशाल नंदी विराजमान है। नीलकंठ महादेव मंदिर के अंदर चतुर्भुज देवी की और गणेश जी की मूर्ति स्थापित हैं। मंदिर की दीवारों पर लिखे हुए शब्दों से पता चलता है की  बाद में राणा सांग ने इस मंदिर का जीर्णोदार करवाया था।  वर्त्तमान समय में नीलकंठ महादेव मंदिर में रोज पूजा अर्चना होती है और शाम को आरती गान। 

7. पार्शव नाथ मंदिर (Parshaw Nath Mandir)



किले परिसर में बना पार्शव नाथ मंदिर नीलकंठ महादेव मंदिर और वेदी मंदिर के बीच एक चट्टान पर बना हुआ है। इस मंदिर को नर सिंह पोखर द्वारा 1451 ईस्वी में बनवाया गया था। मंदिर की छत पर गणेश मंदिर की तरह ही गुम्बद बने हुए हैं। इस मंदिर के गर्भगृह के ललाट पर गणेश जी की प्रतिमा बनी हुए ह जो दर्शाता है यह एक हिन्दू मंदिर था। बाद में विक्रम सम्वत 1508 में इसमें पार्शव नाथ की मूर्ति स्थापित की गई। पार्शव नाथ मंदिर में भी मूर्ति साबुत है।  

8. खेड़ा देवी मंदिर (Kheda Devi Mandir)
खेड़ा देवी माता का मंदिर नीलकंठ महादेव मंदिर की पीछे की तरफ बगल में बना हुआ हैं। यह मंदिर किले परिसर के सबसे पुराने मंदिरो में से एक हैं। खेड़ा देवी मंदिर के बगल में दो छोटे- छोटे मंदिर भी बने हुए थे जो की वर्तमान समय में केवल अवशेष मात्र रह गए हैं। इस मंदिर की छत पर मंडप और शिखर ईंटो से बना हुआ हैं। मंदिर का एक ऊँचा चबूतरा  भी बना हुआ हैं। 

9. जैन मंदिर (1,2,3 ) (Jain Mandir)
किले परिसर में ये जैन मंदिर विजय पोल द्वार के पास पास स्थित हैं। विजय पोल द्वार के पास ये तीनो मंदिर संरचना में बिलकुल एक जैसे है।  इनमे से दो मंदिर विजय के उतर में एक दूसरे की तरफ झांकते हुए ऊँचे चबूतरे पर बने हुए हैं। इन दोनो मंदिरो के गर्भगृह के मुख्य द्वार पर जैन प्रतिमा उत्कृण हैं। साथ ही दोनो मंदिरो में पचरथ गर्भगृह, मंडप और मुखमंडप हैं। इन दोनों मंदिरो के बीच में एक पुराण अवशेष भी है जो सिड किसी मंदिर के ही रहाहे हो। विजय पोल द्वार के पूर्वी हिस्से की तरफ इन दो मंदिरो के जैसा तीसरा जैन मंदिर हैं जो की बनावट में बिलकुल इनकी ही तरह हैं। इनकी बनवत एक जैसी होने की वजह से इन मंदिरो को भारतीय पुरातत्व विभाग ने जैन मंदिर 1, जैन मंदिर 2, जैन मंदिर 3 के नाम से दर्शाया हैं। वर्तमान समय में इन मंदिरो के अंदर कोई प्रतिमा नहीं है। 

10. बावन देवरी मंदिर 
बावन देवरी मंदिर एक अकेला मंदिर नहीं है यह एक बावन मंदिरो का समूह हैं। इस मंदिर का निर्माण भी 1464 ईस्वी में करवाया गया था। मन्दिर एक बड़े परकोटे में है जिसमे 52 छोटे छोटे मंदिर है। इसमें एक मुख्य मंदिर बीचों बीच बना हुआ हैं। इन बावन छोटे छोटे मंदिरो में 52 देवकुलिकाये है जिनके नाम पर इस मंदिर का नाम बावन देवरी रखा गया।  इन बावन मंदिरो में किसी में भी मूर्ति नहीं हैं। बीच में बने मुख्य मंदिर की छत पर गोलाकार गुम्बद हैं। इसकी छत पर से अंदर की तरफ अप्सराओ   की मूर्ति उत्कृण की गई गई हैं। कुछ मूर्तियों में अप्सरा हाथो में माला, दर्पण, गुड़िया और कुछ में वीणा लिए हुए दर्शाई गई हैं। इस मंदिर के बगल में एक और मंदिर है जिसमे कोई मूर्ति नहीं है।  मंदिर का द्रश्य  शानदार नजर आता हैं। बावन देवरी मंदिर का केवल एक ही द्वार है जो की उतर की ओर मुख किये हैं।  वर्तमान समय में इस मंदिर परिसर के चारो तरफ एक खुला प्रांगण हैं जिसमे आसानी से बैठा जा सकता है ।

11. जूना भीलवाड़ा मंदिर 
जूना भीलवाड़ा मंदिर जैन मंदिर 2 से थोड़ा आगे की तरफ बढ़ने पर रास्ते में आता हैं।  वर्तमान समय में इस मंदिर का केवल आधा भाग ही है बाकी खंडर हो चूका हैं। इस मंदिर के प्रांगण से किले का एक शानदार द्रश्य नजर आता हैं। मंदिर के आधार और इसके फैलाव के आधार पर कहा जा सकता है की यह मंदिर उस समय पर काफी भव्य रहा होगा। 

12. गोलेराव मंदिर 
गोलेराव मंदिर कई सारे मंदिरो का एक समूह है जिसमे कुल 9 मंदिर हैं। यह मंदिर समूह जूना भीलवाड़ा मंदिर से थोड़ी ढलान उतरने पर पड़ता हैं। इस मंदिर समूह में 5 जैन मंदिर और 4 हिन्दू मंदिर हैं। यह मंदिर समूह एक बड़े इलाके में फैला हुआ हैं। जूना भीलवाड़ा मंदिर कि तरफ से गोलेराव मंदिर में प्रवेश करने पर पहला मंदिर ही एक हिन्दू मंदिर है उसके बाद 2 जैन मंदिर। मंदिर समूह के बीच में दाहनी और एक बड़ा मंदिर है जिसका शिखर ईंटो से बना हुआ हैं। मंडी समूह के बिलकुल बीच में एक छोटा मंदिर और है जिसमे वर्तमान में कोई मूर्ति नहीं हैं। इस मंदिर का सबसे भव्य मंदिर इस छोटे मंदिर के बिलकुल पीछे एक ऊँचे चबूतरे पर बना हुआ हैं। इस मंदिर को शानदार तरीके से अलंकृत किया गया हैं। यह मंदिर एक क्रॉस के आकर के चबूतरे पर बना हुआ हैं जो की बाकी मंदिर से काफी ऊँचा दीखता हैं। मंदिर की दिवार पर कई साड़ी मूर्ति लगी हुए है जिनमे कीचक वध, अलग अलग देवी देवताओं को दर्शय गया है।  मंदिर के चबूतरे के निचे एक चौकोर कमरा भी बना हुआ है। इस मंदिर के पीछे की और से किला पूरी तरह नज़र आता हैं। 

13. मामादेव मंदिर 
मामादेव मंदिर गोलेराव मंदिर के उत्तर की ओर पेड़ों के बीच तलहटी में पड़ता हैं। इस मंदिर की संरचना में वर्तमान में एक सपाट परकोटा है जिसमे बड़ी बड़ी मुर्तिया हैं। मंदिर में लगी मूर्तियों में मधुसुधन कृष्ण ,महादेव, संकर्षण, कौमारी आदि लगी हुए हैं। इस मंदिर के पास एक कुंड है जिसे मामा देव कुंड कहा जाता हैं। कहते है इस कुंड पर ही उदा ने राजगद्दी हतियाने के लिए महाराणा कुम्भा की धोखे से हत्या कर दी थी।  

14. पृथ्वीराज की छतरी
पृथ्वीराज की 12 खम्बो की छतरी कुम्भलगढ़ दुर्ग में मामादेव कुंड के पास पेड़ो के बीच में स्थित हैं। यह छतरी अष्टकोणीय है जो की एक चबूतरे पर बानी हुई हैं। इस छतरी के शीर्ष पर एक गुम्बद भी बना हुआ हैं। छतरी में मध्य भाग में एक स्तम्भ है जिसमे 17 रानियों के नाम लिखे हुए है। ये उनकी रानियों के नाम है जो पृथ्वीराज के साथ सती  हुई थी जिनकें नाम इस स्तम्भ पर उल्लेखित हैं। 

15. पितलिया देव मंदिर 
पितलिया देव मंदिर पृथ्वीराज की छतरी के उतर में चलने पर किले के पीछे की तरफ पड़ता है। पितलिया देव मंदिर का निर्माण एक जैन सेठ पितलिया शाह द्वारा 1455 ईस्वी में करवाया गया। इस मंदिर का दूसरा नाम वैराट माता का मंदिर भी हैं। यह लोग इसे इस नाम से भी जानते हैं। कहते है की यहाँ पर पितलिया शाह के वंशजों की कुल देवी वैराट माता स्थापित थी। आज इनके वंशज म.प्र. के रतलाम सहर में रहते हैं। मंदिर के गर्भगृह में चबूतरा है जिससे पता लगता है की इसमें कभी मूर्ति रही होगी। लेकिन वर्तमान समय में मंदिर के गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं हैं। इस मंदिर के दिवार और स्तम्भों पर  कई देवी देवताओं की मुर्तिया उकेरी गई हैं। यह मंदिर प्रकृति की गोद में किले के पीछे की तरफ है, जिसकी तरफ जाने का रास्त एक सुखद अनुभव होता हैं। 

16. सूर्य मंदिर 
कुम्भलगढ़ किले का एक ऐसा मंदिर है जो किले के बाद दूसरी सबसे ऊँची चोटी पर बना हुआ हैं। यह मंदिर पितलिया देवा मंदिर के सामने वाली पहाड़ी पर बना हुआ हैं जहा तक पहुंचने के लिए एक कच्चा रास्ता बना हुआ हैं। सूर्य मंदिर इतनी ऊंचाई पर बना हुआ है की यह से पुरे किले परिसर का विहंगम दृश्य आसानी से देखा जा सकता हैं। सूर्य मन्दिर के एक तरफ अरावली की पहाड़ियों का सुन्दर द्रश्य और दूसरी तरफ कुम्भलगढ़ किले का नज़ारा दीखता हैं।  इस मंदिर तक पहुंचने के लिए रामपोल द्वार के सामने एक सीधा रास्ता ढलान की तरफ उतर रहा हैं। जिसके माध्यम से निचे बनी बावड़ी तक पहुंच कर दाहनीओर के रास्ते से सूर्य मंदिर आसानी से पंहुचा जा सकता हैं।   

17. महाराणा प्रताप जन्म स्थली 
राम पोल द्वार से अंदर की ओर प्रवेश करते हुए बादल महल परिसर के पास और पागड़ा पोल द्वार से पहले एक कमरा बना हुआ हैं।  जिसमे वीरशिरोमणि महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था। इस कमरे तक पहुँचने के लिए थोड़ी सीढिया चढ़नी पड़ती हैं। इस कमरे में दो भाग है जिसमे एक खुला भाग और दूसरा बंद। इस कमरे के बहार एक खुला प्रांगण है जो की परकोटे से गिरा हुआ हैं। यहाँ कमरा साल में एक बार ही ( महाराणा प्रताप की जयंती पर ) खुलता हैं। 

18. कुम्भा महल
पागड़ा पोल से अंदर प्रवेश करने पर दाहनी और छोटे प्रवेश द्वार वाला हिस्सा कुम्भा महल कहलाता हैं। इस परिसर में महारणा कुम्भा का कक्ष बना हुआ है था निचे की तरफ बहुत सारे कमरे है। निचे वाले कमरों का केवल ढांचा ही शेष है। इतनी बड़ी हाइट होने के वावजूद भी महाराणा कुम्भा के कक्षों के प्रवेश द्वार बहुत छोटे हैं। इसकी वजह सुरक्षा द्रष्टिकोण बताया जाता हैं। प्रवेश द्वार के छोटे होने से हमला होने पर एक साथ ज़्यादा लोग अंदर नहीं आ सकते थे जिससे उनको भागने का मौका मिला सकता था। 

19. भैरो बाबा का मंदिर 
भैरो बाबा का मंदिर बदल महल परिसर में प्रवेश करते ही बायीं तरफ एक चबूतरे रुपी एक संरचना बानी हुआ है जो की भैरव बाबा का मंदिर हैं। इस जगह पर आकर भैरव मुनि (जिन्होंने स्वयं की बड़ी दी थी ) का धड़ गिरा था। मंदिर के ऊपर एक गुम्बद बना हुआ है जो की स्तंभो पर खड़ा हुआ है। भैरो बाबा के मंदिर के सामने ही एक बड़ा सा चबूतरा बना हुआ है जिसमे एक बड़ा कुंड बना हुआ हैं जिसमे तेल डालकर मसाल जलाते थे। 

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